Hello friends , आज के इस आर्टिकल में हम जानेंगे की वन और वन्य प्राणी संसाधन हमारे लिए कितने महत्वपूर्ण है। इनकी ह्रास का कारण और इनके संरक्षण के उपाय भी जानेंगे। वन संसाधन हमारे लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण संसाधन है इसलिए हमें इसका संरक्षण करना चाहिए। 

वन विस्तार की दृष्टि से भारत विश्व का दसवां देश है। यहां पर करीब 68 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर वन का विस्तार है। रूस में 809 करोड़ हेक्टेयर वन क्षेत्र है जो विश्व में प्रथम स्थान पर है। FAO (food and agriculture organisation) की वानिकी रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 1948 में विश्व में 4 अरब हेक्टेयर वन क्षेत्र था जो 1963 में घटकर 3.8 अरब हेक्टेयर हो गया और 1990 में 3.4  अरब हेक्टेयर वन क्षेत्र बच गया किंतु 2005 में इसमें कुछ सुधार आया और स्थिति लगभग 1948 के समान हो गई अर्थात कुल क्षेत्र 3.95 अरब हेक्टेयर हो गया। यह विश्व के भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 30% है।
                 भारत में वनों का विस्तार एक समान नहीं है, यहां का पूर्वोत्तर राज्य एवं मध्य प्रदेश वनों की दृष्टि से काफी समृद्ध है किंतु अंडमान निकोबार द्वीप समूह सबसे आगे है जहां 90.3% भौगोलिक क्षेत्र में वन विकसित है। वृक्षों के घनत्व के आधार पर वनों को 5 वर्गों में  रखा गया है:_
1) अत्यंत सघन वन 
2) सघन वन
3) खुले वन
4) झाड़ियां एवं अन्य वन
5) मैंग्रोव वन


प्रशासकीय दृष्टि से वनों को निम्नलिखित वर्गों में रखा गया है:_
A)आरक्षित वन :_जो वन जलवायु की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैै उन्हें आरक्षित वन कहते हैं। इसमें लकड़ियां  नहींं काटी जा सकती है। और न ही पशुचारण होता है। वन एवं वन्य जीवो के  संरक्षण के लिए आरक्षित वन को सबसेे अधिक मूल्यवान  माना जाता है। देश में आधे से अधिक वन क्षेत्र आरक्षित वन घोषित किए गए हैं।
B) रक्षित वन:_इस वन में  विशेष नियमों केेेेे अधीन पशुुुुुुुुओं को चराने और सीमित रूप में लकड़ी काटनेे की सुविधा दी जाती है ।वनोंं के अत्यधिक नष्ट होने से बचाने के लिए इसकी सुरक्षा की जाती है।
C) अवर्गीकृत वन:_सभी प्रकार के वन और बंजर भूमि जो सरकार व्यक्तियों समुदायों के स्वामित्व में होतेे हैं। स्वतंत्र एवं अवर्गीकृत वन कहलाते हैं इस प्रकार के वनों में लकड़ी काटने और पशुओं को चढ़ाने पर सरकार की ओर से कोई प्रतिबंध नहीं है सरकार इसके लिए शुल्क लेती है।
आरक्षित एवं रक्षित वन का सबसे अधिक विस्तार मध्य प्रदेश में है जहां कुल  वन क्षेत्र का 75% है। इसके अतिरिक्त जम्मू कश्मीर ,आंध्र प्रदेश ,उत्तराखंड ,केरल ,तमिलनाडु ,पश्चिम बंगाल ,और महाराष्ट्र में भी कुल वनों का एक बड़ा अनुपात आरक्षित वनों का है जबकि बिहार ,हरियाणा ,पंजाब ,हिमाचल प्रदेश ,उड़ीसा और राजस्थान मैं कुल वनों में रक्षित  वन का एक बड़ा अनुपात रक्षित है ।पूर्वोत्तर के सभी राज्यों में और गुजरात में अधिकतर वन क्षेत्र अवर्गीकृत और स्थानीय समुदाय के प्रबंधन में है।

वन्यजीवों के  ह्रास के कारण:__
वन्यजीवों के ह्रास के निम्नलिखित कारण है:_
1) प्राकृतिक आवासों का अतिक्रमण:_ वन्य जीवो के प्राकृतिक आवास जंगल ,मैदानी क्षेत्र ,नदियां ,तालाब ,वेटलैंड, पहाड़ी एवं तराई क्षेत्र आदि है ।जनसंख्या में हो रही अनियंत्रित वृद्धि, औद्योगिक विकास ,शहरीकरण या अन्य परियोजनाएं इनकी आवास की अतिक्रमण कर रही है। यातायात की सुविधाओं में वृद्धि के कारण भी वन्य जीवो के प्राकृतिक आवास का अतिक्रमण हुआ है ।प्राकृतिक निवास स्थान के छिन जाने से वन्यजीवों की सामान्य वृद्धि तथा प्रजनन क्षमता में कमी आई है।

2) प्रदूषण जनित समस्या :_बढ़ते प्रदूषण ने कई समस्याओं को जन्म दिया है ।इनमें वन्यजीवों की संख्या में कमी के प्रमुख कारक अम्ल वर्षा और हरित गृह प्रभाव हैं ।इसके अतिरिक्त वायु ,जल एवं मृदा प्रदूषण के कारण वन एवं वन्यजीवों का जीवन चक्र गंभीर रूप से प्रभावित हो रहा है ।

3) आर्थिक लाभ :_रंग बिरंगी तितलियों से लेकर  मेढक, पक्षियों ,और जंगली जानवरों ,तोता एवं अन्य स्थानीय परिंदों का अवैध शिकार कर बेचा जाता है ।इसकी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कालाबाजारी होती है । चीन ऐसे वन्यजीवों के कालाबाजारी का मुख्य केंद्र है ।
      आर्थिक लाभ के लिए योजनाबद्ध तरीके से खास  प्रजातियों के पेड़ पौधे एवं जीव जंतुओं को स्थानीय ,क्षेत्रीय या राज्य स्तर पर दोहित किए जाने से कई प्रजातियां संकटग्रस्त हो गई हैं। निरंतर शिकार भी वन्यजीवों के लिए एक बड़ी चुनौती है।

भारत में वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा वन एवं वन्य जीवों के संरक्षण के लिए अनेक कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। वन्यजीवों को उनके प्राकृतिक आवास में संरक्षित करने का प्रयास सफल हो रहा है इसे इन सीटू प्रयास भी कहते हैं ।इसके अंतर्गत विस्तृत भूखंड को संरक्षित क्षेत्र घोषित किया जाता है। इसी प्रकार इन्हें संकट से बचाने के लिए कृत्रिम आवासीय संरक्षण का विकास किया जाता है इसे ex situ कहते हैं। एक्स सीटू के प्रयास से जिन प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा है उन्हें संग्रहित किया जाता है।

वन्य प्राणियों के संरक्षण के लिए संरक्षित क्षेत्रों में राष्ट्रीय उद्यान, विहार या अभ्यारण तथा जैवमंडल सम्मिलित हैं।

A) national park :_ऐसे पार्कों का उद्देश्य वन्य प्राणियों के प्राकृतिक आवास में वृद्धि एवं प्रजनन की परिस्थितियों को तैयार करना है इस उद्यान में बाहरी हस्तक्षेप वर्जित होता है जैसे कृषि कार्य ,वन उत्पादों को एकत्र करना ,पशु चारण तथा निर्माण कार्य ।हमारे देश में राष्ट्रीय उद्यान की संख्या 85 है।



B) sanctuary:_यह एक ऐसा सुरक्षित क्षेत्र होता है जहां वन्यजीव सुरक्षित ढंग से रहते हैं ।यह निजी संपत्ति हो सकती है । इस क्षेत्र में कृषि ,वन उत्पाद को एकत्र करने मछली पकड़ने आदि की समिति छूट होती है ।वन्यजीवोंके स्वभाविक जैविक क्रियाएं जैसे घोंसला बनाना, जोड़ा  बनाना पर बाधा पहुंचाने पर मालिकाना अधिकार को सीमित किया जा सकता है।

C) biosphere reserves:_ यह ऐसा क्षेत्र है जहां प्राथमिकता के आधार पर जैव विविधता के संरक्षण के कार्यक्रम चलाए जाते हैं ।इन क्षेत्रों में जैव विविधता के अनुवांशिकी विविधता के रूप में संरक्षित कार्यक्रम चलाया जाता है ।विश्व के 65 देशों में करीब 243 सुरक्षित जैव मंडल क्षेत्र हैं ।भारत में इनकी संख्या 14 है।

वन्यजीवों के संरक्षण के लिए कानूनी प्रावधान:__

*अंतर्राष्ट्रीय नियम:

वन्यजीवों के संरक्षण के लिए दो या दो से अधिक राष्ट्र समूहों

के द्वारा अंतरराष्ट्रीय समझौते के अंतर्गत नियम तथा कानूनी

प्रावधान बनाए गए हैं प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर

 1968 में अफ्रीकी कन्वेंशन अंतरराष्ट्रीय महत्व के वेटलैंड्स

 का कन्वेंशन 1971 तथा विश्व प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक

 धरोहर संरक्षण एवं रक्षा अधिनियम 1972 के अंतर्गत बनाए

 गए अंतरराष्ट्रीय नियमों के द्वारा वन्यजीवों के संरक्षण के

 प्रयास किए जा रहे हैं इस पर सख्ती से अनुपालन करके

 वन्यजीवों की रक्षा की जा सकती है।

*राष्ट्रीय कानून:

भारत विश्व के उन देशों में से है जिसमें पर्यावरण तथा वन्य

 जीवन की रक्षा का प्रावधान संविधान में किया गया है। 

संविधान की धारा 18 के अंतर्गत अनुच्छेद 47 48 तथा 51a

जी वन्यजीवों तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के नियम
 
हैं।

वर्ष 1952 में भारतीय वन्यजीव बोर्ड के गठन के बाद

 वन्यजीवों के संरक्षण के प्रति सरकार का रुख भी गंभीर हुआ

है। प्रांतीय स्तर पर भी वन्य जीव बोर्ड का गठन किया गया है

। वन्य जीव सुरक्षा एक्ट 1972 नियमावली 1973 एवं

 संशोधित एक्ट 1991 के अंतर्गत पक्षियों तथा जानवरों के 

शिकार पर प्रतिबंध लगाया गया है।

वनों के संरक्षण के लिए बनाए गए वन संरक्षण एक्ट 1980 

एवं नियमावली 1981 भी कानूनी प्रावधान बड़े प्रभावशाली 

है। जैव विविधता अधिनियम 2002 के अंतर्गत जैव

 विविधता के संरक्षण के लिए स्थानीय प्रखंड ,जिला और 

राज्य स्तर परकमेटियां गठित करने का प्रावधान किया गया 

है।