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ट्रांसफॉर्मर क्या है ?इसके प्रकार ,सिद्धांत ,बनावट और कार्यविधि क्या हैं ?

आज के इस आर्टिकल में हम जानेंगे की ट्रांसफॉर्मर क्या होता है और यह किस सिद्धांत पर कार्य करता है।इस पोस्ट में हम यह भी जानेंगे की ट्रांसफॉर्मर कितने प्रकार के होते हैं और इसकी संरचना कैसी होती है।

ट्रांसफार्मर क्या है?

ट्रांसफॉर्मर एक ऐसा डिवाइस है जिसके द्वारा विद्युत ऊर्जा को एक परिपथ से दूसरे परिपथ मे बिना ऊर्जा ह्रास के स्थानांतरित किया जाता है यह युक्ति अन्योन्य प्रेरण के सिद्धांत पर कार्य करती है तथा इसमे ऊर्जा सथनांतरण के क्रम मे निम्न वोल्टेज को उच्च वोल्टेज मे या उच्च वोल्टेज को निम्न वोल्टेज मे बदलने की व्यवस्था रहती है |

Transformer kya hai,what is transformer
Pic: Transformer

ट्रांसफार्मर के प्रकार:-

ट्रांसफॉर्मर मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं :
1) उच्चाई ट्रांसफॉर्मर (step up transformer )
2) अपचायी ट्रांसफॉर्मर (step down transformer )
1)step up transformer:इसके द्वारा निम्न वोल्टेज वाली प्रबल प्रत्यावर्ती धारा को उच्च वोल्टेज वाली निम्न धारा मे बदल जाता है।
2)step down transformer :इसके द्वारा उच्च वोल्टेज वाली निम्न प्रत्यावर्ती धारा को निम्न वोल्टेज वाली प्रबल धारा मे बदल जाता है | 
ट्रांसफॉर्मर का उपयोग केवल प्रत्यावर्ती धारा  (a.c )के परिपथ मे ही किया जाता है|

बनावट :(construction)-

इस यंत्र मे मुख्य तीन भाग होते हैं :
1)परतदर क्रोड 
2)प्राथमिक कुंडली 
3)द्वितीयक कुंडली 
इसमे नरम लोहे की पतियों से बनाया गया एक आयताकार परतदार क्रोड होता है जिसकी पत्तियां एक दूसरे से विद्युत रोधी (इंसुलटेड)रखी जाती है पतियों को विद्युत रोधी रखने से भंवर धाराएं (eddy currents )कम पैदा होती है जिससे विद्युत ऊर्जा का ह्रास काम हो जाता है |क्रोड की आमने सामने की भुजाओ पर तांबे के तार की एक एक कुंडली p और s लिपटी रहती है जो लोहे के क्रोड से तथा आपस मे भी विद्युतरोधित रहती है |इनमे एक कुंडली p मे मोटे तार के कम फेरे रहते है तथा दूसरी कुंडली s मे पतले तार के अधिक फेरे रहते हैं |इन कुंडलियों मे एक को प्राथमिक कुंडली P तथा दूसरे को द्वितीयक कुंडली S कहा जता है |

कार्यविधि (working ):

जब प्राथमिक कुंडली के सिरों के बीच प्रत्यावर्ती विद्युत वाहक बल का स्रोत लगाया जाता है तब प्राथमिक कुंडली से प्रत्यावर्ती धारा प्रवाहित होती है तथा कुंडली के प्रत्येक फेरे से चुंबकीय फ्लक्स संबद्ध हो जाता है |यह फ्लक्स नरम लोहे के परतदार क्रोड से गुजरता हुआ द्वितीयक कुंडली से भी सम्बद्ध हो जाता है |

ट्रांसफॉर्मर में ऊर्जा क्षय के निम्नलिखित कारण हैं :
1)ताम्र क्षय (copper loss ):प्राथमिक कुंडली एवं द्वितीयक कुंडली के तार मे धारा प्रवाहित होने पर ऊष्मा उत्पन्न होती है |इस प्रकार विद्युत ऊर्जा का ऊष्मा के रूप मे क्षय होता है जिसे ताम्र क्षय कहा जाता है |
2)लौह क्षय(iron loss) : ट्रांसफॉर्मर के क्रोड मे फ्लक्स के परिवर्तन के कारण भँवर धाराएं (eddy current )प्रेरित होती है जिससे विद्युत ऊर्जा का क्षय होता है |इसे लौह क्षय कहा जाता है तथा इसे कम करने के लिए क्रोड को परतदार बनाया जाता है |
3)फ्लक्स क्षरण (flux leakge ): प्राथमिक एवं द्वितीयक कुंडली से सम्बद्ध चुंबकीय क्षेत्र रेखाएं पूर्णतः क्रोड से न जाकर अंशतः वायु से होकर भी जाती है |
4) शैथिल्य क्षय (hysteresis loss ):कुंडली से प्रत्यावर्ती धारा के प्रवाह के कारण लौह क्रोड magnetising cycle से गुजरता है तथा प्रत्येक पूर्ण चक्र मे ऊर्जा का क्षय होता है जिसे शैथिल्य क्षय कहा जाता है |इस क्षय को कम करने के लिए सिलिकन लोहा के क्रोड का उपयोग किया जाता है क्यूंकि इसका शैथिल्य लूप पतला होता है |
ऊर्जा के क्षय होने पर भी आधुनिक ट्रान्सफर से लगभग 90%तक की दक्षता (efficiency )प्राप्त की जाती है |
दोस्तों उम्मीद है की आपको पता चल गया होगा की ट्रांसफार्मर क्या होता है और यह किस सिद्धांत पर कार्य करता है।

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